Plato का राजनीतिक दर्शन | CUET PG , UGC NET के लिए आदर्श राज्य से न्याय तक की पूरी व्याख्या [हिन्दी में ]

Plato का राजनीतिक दर्शन CUET PG , UGC NET के लिए आदर्श राज्य से न्याय तक की पूरी व्याख्या [हिन्दी में ]

प्लेटो का दर्शन : प्लेटों का दर्शन राजनीति से संबंधित  माना जाता हैं क्योंकि उन्होंने राज्य की अवधारणाएं देते हुए , राज्य की प्रकृति, राज्य में कार्य विभाजन, राज्यों का वर्गीकरण , प्रजातंत्र सम्बंधी विचार , आदर्श राज्य, तथा न्याय के सिद्धांत जैसी अवधारणाएं प्रस्तुत की हैं । अब हम प्लेटों के इन सभी दर्शनों के विचारों की व्याख्या करेंगे। ये आपको CUET PG, UGC NET तथा राजनीति विज्ञान से सम्बंधित प्रत्येक परीक्षा के लिए पूर्णतः मदद करेगा ।

प्लेटों का जीवन परिचय:

विवरण जानकारी
जन्म :- एथेंस में 428 ईसा वर्ष पूर्व
अनुयायी /ग़ुरू :- सुकरात
पिता :- कोंड्रास वंश का [ एथेंस का अंतिम शासक ]
माता :- सोलन वंश की [ प्रसिद्ध विधान निर्माता ]
शिक्षा :- प्रसिद्ध अध्यापकों द्वारा व्याकरण , व्यायाम और संगीत की शिक्षा प्राप्त की | 8 वर्ष तक सुकरात से शिक्षा प्राप्त की |
स्थापित संस्थान :- प्लेटो ने ऐकडेमिक नामक विधालय की स्थापना की |
लेखन शैली :- लेखन शैली साभयवादिक हैं |
प्रमुख रचनाएं :- यूथीफ्रोन, अपौलौजिया, क्रिर्तोन, फएदीन, कातील्स चियातेतस सौफिस्तीस पौलिटिक्स सिक्योसियान् फएद्रस, थियोगीस्, सर्मिदीस, लाखेस्, लीसिस्, प्रोतागोरास्, गौर्गियास्, मैलोन, इयौन, किलतोफोन, पॉलितैड्या अथवा रिपब्लिक, नोमोइ अथवा लाज़ ।

 

प्लेटो एक आदर्शवादी था ?

आपके मन में कईं प्रश्न होंगे की क्या प्लेटो आदर्शवादी था? और प्लेटो का आदर्शवाद कैसा था ? यह आदर्शवाद किसकी व्याख्या करता था ?आदर्शवादी होने से कौनसे वे तथ्य हैं जो प्लेटो के दर्शन को नकारात्मक तथा सकरात्मक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं ?प्लेटो के आदर्श राज्य की क्या अवधरनाएं थी ? आइएं अब हम प्लेटो के आदर्शवादी पहलुओ को उजागर करते हैं :-

> प्लेटो का आदर्शवाद कैसा था ?
  •  प्लेटों का आदर्शवाद यथार्थवाद (वास्तविकता) से दूर काल्पनिक प्रतीत होता हैं ।
  • उसने अपनी रचना रिपब्लिक में एक ऐसे आदर्श राज्य की कल्पना की हैं जिसमें दार्शनिकों का शासन होगा तथा आदर्श राज्य में कानून अनावश्यक हैं। अर्थात् उसका आदर्शवाद कानूनहीन राज्य की स्थापना करता हैं। 
  • प्लेटों ने अपने ग्रंथ रिपब्लिक में आदर्शवाद को एक कल्याणकारी और सद्गुणी राज्य के रूप में उल्लेखित किया हैं ।
  • उसका आदर्शवाद व्यक्ति के चरित्र निर्माण और नैतिकता के विकास के लिए आवश्यक था |
>प्लेटों का आदर्शवाद किसकी व्याख्या करता हैं?
  •  प्लेटों का आदर्शवाद:–आदर्श राज्य की व्याख्या करते हुए न्याय विषय का उल्लेख, दार्शनिक राजा, आदर्श राज्य में शिक्षा, कार्य का विभाजन तथा आदर्श राज्य के महत्वपूर्ण स्तंभों का उल्लेख प्रस्तुत करता हैं ।
  • वह आदर्श राज्य में काल्पनिक  तर्कों द्वारा दार्शनिक राजा को शासन के लिए सर्वोत्तम मानता हैं ।
  • प्लेटों को दृढ़ विश्वास था कि जब तक शासन सत्ता दार्शनिक शासकों को नहीं सौंपी जाएगी तब तक राज्य में नागरिकों के हित के कार्य नहीं होंगे तथा राज्य में अशांति उत्पन्न होगी।
  • प्लेटों के अनुसार शिक्षा ऐसी हो जो मनुष्य के बौद्धिक विकास के साथ साथ शारीरिक विकास को भी प्रबल बनाएं।
  • प्लेटों के अनुसार न्याय की स्थापना के बिना आदर्श राज्य का निर्माण नहीं किया जा सकता |
>आदर्शवादी होने से कौनसे वे तथ्य हैं जो प्लेटो के दर्शन को नकारात्मक तथा सकरात्मक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं ?
  • सकारात्मक दृष्टिकोण:–  प्लेटो के अनुसार आदर्श राज्य का शासक एक दार्शनिक होना चाहिए। वह दार्शनिक शासक एक कलाकार की तरह होता है जो शासन की कला में निपुणता प्राप्त करता है। जैसे कलाकार लगातार अभ्यास से परिपूर्ण होता है, वैसे ही एक शासक भी बुद्धि, नैतिकता और न्याय के गुणों से शासन करता है। यह विचार आदर्श समाज की कल्पना को जन्म देता है जिसमें बौद्धिक और शारीरिक दोनों विकास को महत्व दिया गया है।
  • प्लेटों आदर्श राज्य की स्थापना के लिए न्याय की स्थापना को अनिवार्य मानता हैं और प्लेटों के न्याय की अवधारणा कानूनी न होकर के नैतिक हैं इसलिए वह कहता हैं कि राज्य में कानून अनावश्यक हैं । अर्थात् उसका तात्पर्य व्यक्ति की नैतिकता में न्याय को स्थापित करना हैं ।
  • नकारात्मक दृष्टिकोण:–  प्लेटो का आदर्शवाद व्यावहारिक जीवन से कुछ हद तक कटा हुआ प्रतीत होता है। जब वह कहता है कि शासक केवल दार्शनिक हो, तो वह यह मान लेता है कि दार्शनिक साहस, व्यावहारिकता और निर्णय क्षमता जैसे गुण अपने आप रखता है, जबकि यह जरूरी नहीं है। यह आदर्श सोच वास्तविक शासन की जटिलताओं में सफल नहीं हो सकती, क्योंकि केवल ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं, साहस और व्यावहारिक बुद्धि भी जरूरी है।
  • प्लेटों का यह विचार व्यावहारिकता से दूर प्रतीत होता हैं कि राज्य में कानून अनावश्यक हैं क्योंकि केवल नैतिकता पर आधारित शासन की अनदेखी करना भूल होगी , वास्तविक समाज में सभी लोग नैतिक रूप से आदर्श नहीं होते , ऐसे राज्य में अव्यवस्था तथा अशांति उत्पन्न हो सकती हैं।
 

राजशास्त्र के सभी विद्वानों का मानना हैं कि प्लेटों पर सुकरात का प्रभाव देखा जा सकता हैं। अगर नग्न दृष्टि से देखा जाए तो प्लेटों के विचारों पर सुकरात का इतना अधिक प्रभाव था कि वहां ये पता लगाना मुश्किल होगा कि कहां पर उसके सुकरात से प्रभावित विचार हैं और कहां वे मौलिक प्रतीत होते हैं ।

प्लेटों के विचारों पर सुकरात का निम्नलिखित प्रभाव देखा जा सकता हैं :-
  1. सुकरात का मानना हैं कि सद्गुण ही ज्ञान हैं और ज्ञान से ही साहस, संयम, विवेक तथा न्याय आदि गुणों का जन्म होता हैं । इसी प्रकार इन विचारों के विवरण से ही प्लेटों ने दार्शनिक शासक की अवधारणा प्रस्तुत की हैं ।
  2. प्लेटों ने सुकरात की तरह ही दार्शनिक पद्धति का अनुसरण किया। इस पद्धति में जिज्ञासु व्यक्ति भिन्न भिन्न विचारकों के सिद्धांतों का विश्लेषण कर सत्यता की खोज करता हैं । इस पद्धति में दोनों ने ही प्रश्नोत्तर विधि का उपयोग किया ।
  3. सुकरात ने माना हैं कि एक शासक में वे गुण होने चाहिए जो एक चिकित्सक में होते हैं वह अपने कार्य में इस तरह निपुण हैं कि एक रोगी को रोग मुक्त कर सकता हैं , इसी तरह प्लेटों ने भी चिकित्सक के समान दार्शनिक शासक को आदर्श राज्य के लिए महत्वपूर्ण माना हैं ।

प्लेटों ने क़रीब चालीस (40) वर्ष की आयु में अपना एक प्रसिद्ध ग्रंथ रिपब्लिक प्रस्तुत किया। इस ग्रंथ को लगभग 10 वर्षों तक लिखा गया। यह ग्रन्थ ज्यादा राजशास्त्र से सम्बन्धित न होकर न्याय और आदर्श राज्य के लिए उल्लेखित हैं। इस ग्रंथ की मुख्यवस्तु प्लेटों की आदर्श राज्य की कल्पना हैं। प्लेटों के आदर्श राज्य की कल्पना केवल राज्यों के निरीक्षण पर आधारित नहीं थी , चूंकि यह तर्क , अनुभव, परीक्षा, तुलना और आलोचना पर आधारित थी।बैंजामिन ज़ोवेट ने इस ग्रंथ की महत्ता को बताते हुए लिखा हैं कि –
“यह प्लेटो की कृतियों का वह केन्द्र बिन्दु है जिसके चारों ओर हम बड़ी सरलता से ज्ञान माला के पुष्पों की भांति उसके समस्त सम्वादों को पिरो सकते हैं।”
(स्रोत: प्लेटो की रिपब्लिक पर टिप्पणी — बैंजामिन जोवेट, हिन्दी अनुवाद)

प्लेटों के रिपब्लिक की विषय–वस्तु

प्लेटों की रिपब्लिक न केवल आदर्श राज्य तथा न्याय की परिकल्पना करती हैं अपितु यह मानव के समग्र दर्शन को उजागर करती हैं।

  1. 📕 पुस्तक 1 और 2 (प्रारंभिक खंड) :– मानव जीवन का दर्शन जिसमें नैतिकता का विषय, न्याय की प्रकृति तथा न्याय का उद्देश्य जैसी मानव जीवन की अनेक बातें शामिल हैं ।
  2. 📘 पुस्तक 3,4 और 5 :– राज्यों में कार्य विभाजन, शिक्षा प्रणाली का वर्णन तथा आदर्श राज्य की संरचना का उल्लेख। प्लेटों ने आदर्श समाज को चार वर्गों में विभाजित किया शासक, सैनिक, उत्पादक और सेवक तथा इनके अपने कर्तव्यों का पालन करना ही न्याय की स्थिति को बनाये रखने का स्तंभ माना ।
  3. 📗 पुस्तक 5 , 6 और 7 :– प्लेटों ने साम्यवाद तथा दार्शनिक राजा के आधार पर आदर्श राज्य व न्याय को संदर्भित किया।
  4. 📙 पुस्तक 8 और 9 :– राज्यों तथा नागरिकों के विकृतियों का विवरण |
  5. 📔 पुस्तक 10 :– कला, आत्मा , जीवन और मानव के गुणों पर विचारों की संकल्पना।
~ रिपब्लिक की आलोचना:–
  • व्यावहारिकता व यथार्थवाद का अभाव:– रिपब्लिक में जिस आदर्श राज्य का उल्लेख किया गया हैं वह वास्तव में व्यवहारिक जीवन से दूर प्रतीत होता हैं। हमारे लिए उचित संकल्पना वही होगी जो धरातल की वास्तविकता का दर्पण पेश करे। किसी राज्य की कल्पना किस आधार पर उचित मानी जा सकती हैं ? देशकाल और परिस्थित बदलने के साथ साथ राज्य की कल्पना में भी स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए।
  • कानूनहीन राज्य :– प्लेटों ने आदर्श राज्य का संचालन दार्शनिक शासक को सौंप दिया और इस कारण राज्य में कानून को अनावश्यक बतलाया। जो कि यह कहना कदापि उचित नहीं होगा कि उस राज्य में न्याय को भी स्थापित किया जा सकता हैं। वास्तविकता में सभी लोग आदर्श व नैतिक नहीं होते जो बगैर कानून राज्य की कल्पना की जाए।
  • निम्न वर्ग की उपेक्षा:– प्लेटों ने सेवक वर्ग को किसी प्रकार के राजनीतिक अधिकार नहीं दिए जिससे लगता हैं कि निम्न वर्ग की अवहेलना कर उन्हें किसी योग्य नहीं माना तथा राजनैतिक सुविधाओं से वंचित रखा हैं। ये विचार न्याय के सिद्धांत के सर्वथा विरुद्ध हैं। कोई भी राजशास्त्र इस प्रकार के वर्ग को वंचित रखने की सलाह नहीं देगा तथा असमानता की जड़ को पैदा नहीं करेगा।
  • प्लेटो द्वारा प्रस्तुत आदर्श राज्य की कल्पना उस समय के छोटे और आत्मनिर्भर नगर-राज्यों पर आधारित थी। उन्होंने जिस राज्य का वर्णन किया, उसमें जनसंख्या बहुत सीमित थी — लगभग 5040 नागरिक। उस काल में यह संभव था, लेकिन आज के आधुनिक और विशाल जनसंख्या वाले राष्ट्रों में इस प्रकार का आदर्श राज्य व्यावहारिक नहीं माना जा सकता। इसलिए प्लेटो का यह आदर्श राज्य आज के संदर्भ में अप्रासंगिक प्रतीत होता हैं।
प्लेटों ने कईं दर्शन पद्धतियां अपनाई जैसे ऐतिहासिक, पौराणिक, दार्शनिक, निगमनात्मक, कल्याणकारी, दृष्टव्य तथा द्वंदात्मक पद्धतियो का अनुसरण कर अपने दर्शन को संपूर्ण रूप दिया।

उन पद्धतियों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से हैं :—

1.इतिहास की पद्धति का दृष्टिकोण:– 

प्लेटो ने जिस आदर्श राज्य की स्थापना की उसको अंतिम रूप से विकास के लिए राज्य को इतिहास के चार चरणों से गुजरना होता हैं ।
वह चार चरण:– समाजवाद , अधिनकवाद, तानाशाही तथा प्रजातंत्र हैं ।

2.पौराणिक पद्धति:—

प्लेटों ने अपने दर्शन के विचारों को पौराणिक कथाओं के आधार पर जनता के सामने रखा।जिससे जनता का ध्यान आसानी से प्लेटों के विचारों पर केंद्रित हो सकें। अर्थात् पौराणिक पद्धति के द्वारा विचारों का विश्लेषण करना आसान था।

3.दार्शनिक सोच और तर्क का इस्तेमाल:—

प्लेटो ने अपने दर्शन में दार्शनिक पद्धति को अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। वे ‘प्रत्यक्ष ज्ञान’ को ही सत्य मानते थे तथा स्वप्न या कल्पना में भी सत्य की संभावना स्वीकार नहीं करते थे। उनके अनुसार राज्य मात्र एक राजनीतिक संस्था नहीं है, बल्कि यह नैतिक मूल्यों पर आधारित एक दार्शनिक संकल्पना है।
प्लेटो का विचार था कि किसी भी राज्य की स्थिरता और समृद्धि तभी संभव है जब वह विवेक, न्याय और तर्क पर आधारित हो। प्लेटों राज्य को कल्याणकारी मानते हुए राज्य के बाहरी स्वरूप को को स्वीकार नहीं करते ।

4.निगमनात्मक पद्धति (Deductive method) :—

निगमनात्मक पद्धति में मनुष्य सर्वप्रथम सामान्य सिद्धांतों पर विचार करता हैं फिर वह सामान्य सिद्धांतों के विश्लेषण से विशिष्ट की तरफ जाता हैं। इसमें सामान्य सिद्धांतों से निष्कर्ष निकाला जाता हैं। प्लेटों ने इसी प्रकार सामान्य लोगों के विचारों का आंखलन कर विशिष्ट निष्कर्ष निकाला जिसके आधार पर उसने राज्य की भूमिका स्पष्ट की हैं।

5. द्वंदात्मक पद्धति:—

इस पद्धति में प्लेटों को सुकरात से प्रभावित मन जाता हैं। प्लेटों के गुरु सुकरात का मानना था कि ‘व्यक्ति के ज्ञान की खोज करनी हैं तो उसके अंदर की आत्मा को परखा जाए। प्रश्नोत्तरी प्रणाली इस ज्ञान में साधक हैं। इस पद्धति में जब संवाद का माध्यम अपनाया जाता हैं तो एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के विचारों की भावनाओं को जान सकता हैं।’ इन विचारों की खोज कर सत्यता पर पहुंच जाना ही द्वंद पद्धति की प्रमुख विशेषता हैं।

6.दृष्टांतवादी पद्धति:—

प्लेटों ने दृष्टांतो का सहारा लिया। प्लेटों का मानता था कि जिस प्रकार एक ‘कलाकार ‘ अपनी कला में पूर्णतः निपुण होता हैं उसी प्रकार शासक भी अपनी शासन की कला को सीख लेता हैं और वह शासन की सत्ता में राजनीतिज्ञ कुशल बन जाता हैं।

हम जब अपने इतिहास को खंगालने की कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि समाज को बनाने के लिए व्यक्ति एकत्र हुए उन्होंने अपने सारे अधिकार एक व्यक्ति को सौंप दिए ताकि उस समाज के लोगों की वह व्यक्ति रक्षा करने में समर्थ हो, वह व्यक्ति राजा कहलाया। अब हम इसी उद्धरण से प्लेटों के राज्यों का वर्गीकरण समझने की कोशिश करते हैं। माना एक व्यक्ति हैं जो शासन में बैठा हैं और वो हमारे समाज को चलाने में सक्षम हैं इसी तरह दूसरा व्यक्ति उससे ऊपर समाज से मिलकर बने राज्यों को चलाता हैं और उससे ऊपर का शासक देश का शासन चलाता हैं हम किसको सबसे सर्वश्रेष्ठ मान सकते हैं? वह जो समाज को उत्कृष्टता प्रदान करता हैं , वह जो राज्यों की स्थिति बरकरार रखता हैं या वह जो देश पर शासन करता हैं?
यहां अब आप इन तीनों में से एक का चयन करने पर खुदको विफल पाएंगे। क्या आप मनुष्यों के बगैर, समाज, राज्य तथा देश की कल्पना कर पाओगे? क्या आप व्यक्ति की मंजूरी के बग़ैर शासन की सत्ता में बैठे व्यक्ति की कल्पना कर पाओगे?

अब आप मेरी इन प्रश्नावली से प्लेटों के वर्गीकरण को समझ सकते हैं कि व्यक्ति का विकास समाज को उन्नतिशील बनाता हैं और समाज की उन्नति से राज्य की उन्नति होती हैं, चूंकि जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति सजग नहीं होगा तो उनका नैतिक चरित्र क्षीण हो जाता हैं और इस तरह समाज का पतन होगा और समाज के पतन से राज्य भी पतनोन्मुख हो जाता हैं। इस पतन की प्रक्रिया के संक्रमण को रोकने के लिए प्लेटों ने निम्नलिखित राज्यों का वर्गीकरण किया:—

1. कीर्ति तंत्रात्मक राज्य (Timocracy) :—

जब शासन का संचालन जनता के हितों की पूर्ति के लिए किया जाता हैं इसका केंद्र जनता का भौतिक सुख हैं। इस प्रकार की शासन प्रणाली में सत्ता उन लोगों के पास होती हैं जो धनी वर्ग हैं और संपत्ति सम्पन्न हैं।
यह सत्ता तब लागू होती हैं जब जनता का रक्षक ही अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए जनता के कल्याण को भूल जाता हैं और उनके हितों को अनदेखा कर देता हैं तो उस समय शासन का स्वरूप कीर्ति तंत्र हो जाता हैं।

2. अल्पतंत्रात्मक राज्य ( Oligarchy ) :—

अल्पतंत्र राज्य से मतलब हम कुछ प्रभुत्वशाली लोगो से समझ सकते हैं जो समाज में कुछ एक तबके के लोग संपन्नशील होते हैं। यह शासन कुलीनवर्ग के लोगों के हाथों में होता हैं। जब कीर्ति तंत्र का पतन होने लगता हैं तो अल्पतंत्र का जन्म होता हैं और धीरे धीरे प्रभाव में आना शुरू हो जाता हैं।

3. तानाशाही ( Tyranny ) :–

तानाशाही वह राज्य हैं जिसमें सम्पूर्ण सत्ता एक अकेले शक्तिशाली व्यक्ति के हाथ में होती हैं। वह सत्ता को प्राप्त करने के लिए बल तथा छल– कपटपूर्ण नीति का प्रयोग करता हैं। ऐसे राज्य में प्रजा उस शासक की गुलाम हो जाती हैं । प्लेटों ने ऐसे राज्य को अन्याय, अधर्म तथा अनैतिकता का प्रतीक बताया। इस सत्ता की बागडोर गलत व्यक्ति के हाथ में चली जाती हैं।

4. लोकतांत्रिक राज्य ( Democracy State ):–

प्लेटों के अनुसार लोकतंत्र आदर्श राज्य का विशाल व विश्वसनीय रूप हैं। जब प्रजा के साथ अन्याय होने लगता हैं और शासक भ्रष्ट हो जाता हैं तो जनता अन्याय और शासक की क्रूरता को रोकने के लिए विरोध में खड़ी हो जाती हैं। इस समय जनता अपने हितों के प्रति जागरूक हो जाती हैं और न्याय की मांग करने लगती हैं। तब इसी स्थिति में लोकतंत्र स्वमेव प्रतिस्थापित हो जाता हैं।

5. आदर्श राज्य ( Aristocracy ) :–

Aristocracy दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना हैं — “Aristos” जिसका अर्थ हैं श्रेष्ठतम, “Kratos” इसका अर्थ हैं शासन।
प्लेटों का लोकप्रिय राज्य आदर्श राज्य हैं। प्लेटों का मानना था कि यह राज्य नैतिकता , न्याय तथा विवेक की दृष्टि से सबसे सर्वश्रेष्ठ उत्तम राज्य हैं। क्योंकि इसमें शासन करने वाला व्यक्ति योग्यवान हैं जो विशेषताएं केवल दार्शनिक में हैं। इसमें शासन की सत्ता दार्शनिक राजा के हाथ में होगी।

प्लेटों के कार्य विभाजन में व्यक्ति की योग्यता जैसे विवेक, साहस तथा क्षुधा का प्रतिनिधित्व किया गया हैं। प्लेटों का मानना हैं कि कुछ व्यक्ति अपने आप को कृषि करने योग्य मानते हैं तो कुछ वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और कुछ घर बनाने में सक्षम हैं। इसके तत्वाधान में अनेक शिल्पकार और श्रमजीवी बन जाते हैं। समाज में कार्य का विभाजन अपनी योग्यता तथा व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुसार हो जाता हैं। कोई बढ़ई, सुनार, लुहार, व्यापारी, चिकित्सक बन जाता हैं। इस प्रकार व्यक्ति के अनुरूप श्रम विभाजन हो जाता हैं।

प्लेटों समाज के कार्यों का विभाजन निम्नलिखित तीन वर्गों में करता हैं:–
  • 1. प्रशासक वर्ग:– प्रशासक (अर्थात जो किसी संस्था, संगठन, विभाग, क्षेत्र या शासन-तंत्र का संचालन, नियंत्रण और व्यवस्थापन करता है।) का कार्य प्रशासन के कार्यों का सुनिश्तित संचालन करना हैं। एक ऐसी व्यवस्था का संचालन करना जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने कर्तव्यों का उचित ढंग से पालन करे।
  • 2. सैनिक वर्ग:– इस वर्ग में साहस तत्व की प्रधानता होती हैं। इसका कार्य राज्य पर विपत्ति की स्थिति में संपूर्ण राज्य की साहसपूर्वक रक्षा करना हैं। यह बाहरी देशों से या आंतरिक संकट भी हो सकता हैं। सैनिक राज्य की ढाल बनकर अपना कर्तव्य का निर्वहन करते हैं।
  • 3. उत्पादक वर्ग:– उत्पादक वर्ग संसाधनों का अधिकाधिक उत्पादन कर अन्य वर्गों की क्षुधा को शांत रखने का प्रयत्न करता हैं। उत्पादक वर्ग का महत्वपूर्ण कार्य पालन पोषण के साधनों को एकत्र कर उसकी पूर्ति करना हैं।
प्लेटों के श्रम विभाजन के सिद्धांत की व्याख्या

प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटों का मानना था कि समाज की समृद्धि तभी संभव हैं जब प्रत्येक व्यक्ति अपनी समता अनुसार कार्य करे और जिसके लिए वह स्वाभाविक रूप से उस कार्य को करने के लिए बना हैं। उसके स्वाभाविकता की झलक उसके अंत: मन में निहित होती हैं। प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध कृति “गणराज्य” (The Republic) में कहा है:                  “सभी वस्तुएँ अधिक मात्रा में, सरलता से और उत्तम रूप में तब उत्पन्न होती हैं, जब एक व्यक्ति केवल एक ही कार्य करता है, जो उसकी स्वाभाविक योग्यता के अनुकूल हो।”                                                                                                                   इस विचार के अनुरूप ऐसा प्रतीत होता हैं कि प्लेटों के आर्थिक व्यवस्था और समाज के सन्तुलन का आधार व्यक्ति की समता को माना हैं।

प्लेटों ने अपनी किताब Republic का मुख्य विषय वस्तु न्याय की प्रकृति तथा राज्य की स्थिति को सुनिश्चित किया हैं । एक प्रसंग हैं कि एकबार पॉलिमार्क्स के घर पर कई लोग वार्तालाप करते हुए व्यक्ति के अधिकार एवम् मौलिकता पर विचार करते हैं वहां यह प्रश्न उठता हैं कि मनुष्य के जीवन व्यतीत करने का कौनसा तरीका उचित माना जाएं? प्लेटों इस विचार पर अपने न्याय विषय का उल्लेख करते हैं। इसी प्रकार एक व्यक्तव्य केफ़ालस का सत्य की ओर संकेत होता हैं। दूसरी ओर ग्लाउकोन थ्रेसिमेकस न्याय की व्यवहारवादी परिभाषा प्रस्तुत करते हैं।

∆ प्लेटों के न्याय की व्याख्या:– 

जैसा कि हमने देखा किस तरह पॉलिमार्क्स के घर मनुष्य के जीवन और उसके अच्छे बुरे को लेकर तर्क वितर्क होते हैं। इस तरह प्लेटों सभी के सिद्धांतों का खंडन करते हुए न्याय के विषय में अपने विचारों को बतलाता है।

प्लेटों का मानना था कि उसके द्वारा दिए गए न्याय के विचारों को ग्रहण करने से राज्य में समृद्धि आएगी और समाजिक व राजनैतिक दोष दूर होंगे। प्लेटों के सिद्धांत में आप पाएंगे कि वो आदर्श राज्य को न्याय के रूप में परिभाषित करते हैं जिसका अर्थ हैं कि जहां अन्याय से न्याय की प्राप्ति होगी वहां आदर्श राज्य की स्थापना की संभावना बढ़ेगी और जहां आदर्श राज्य होगा वहां सब अपने अलग अलग कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे तथा शासन की सत्ता दार्शनिक के पास होगी और वह दार्शनिक जिसमें बुद्धिजीवी की प्रधानता होती हैं वो राज्य को चलाने में सुयोग्य और सक्षम होगा। जब आदर्श सिद्धांत संगठित क्षेत्र में रहेंगे तो वह न्याय का प्रवेश द्वार खुलेगा और न्याय का निवास स्थान होगा। प्लेटों के विचार दर्शाते हैं कि न्याय को आदर्श राज्य की धारणा से अलग करना कदापि उचित नहीं होगा। 

★ प्लेटों के आदर्श राज्य के चार गुण हैं :— बुद्धिमता, संयम और न्याय।

★ न्याय राज्य के रीढ़ की हड्डी हैं जिसे हटाया नहीं जा सकता। यह राज्य का सर्वोपरि लक्षण हैं। न्याय वह साधन हैं जो मनुष्य के जीवन को संतुलित बनाए रखता हैं उदाहरण के लिए हम अपने आस पास के वातावरण को देखे तो पायेंगे कि यहां वर्ग भिन्न होते हुए भी अभिन्न रहते हैं। न्यायपूर्ण समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने उसी कार्य को सुनिश्चित करता हैं जिसमें उसे करने की अधिकतम योग्यता होती हैं। न्याय आत्मा हैं जो समाज के ऐसे आंतरिक भाग में निवास करती हैं जहां लोग सूझबूझ और अच्छी राह का अनुकरण करते हैं जहां अन्याय या बुराई की कोई जगह नहीं होती हैं। समाज की नैतिकता न्याय में अवस्थित हैं।

प्लेटों के न्याय की विशेषताएं:—

1. राज्य में नागरिकों का वर्गीकरण:– प्लेटों के न्याय की धारणा में राज्यों के नागरिकों का वर्णन तीन तरह के सन्दर्भ में किया गया हैं। पहला, रक्षक/ संरक्षक – जो बुद्धिजीवी हैं। दूसरा, सैनिक – साहस तत्व की प्रधानता। तीसरा, श्रमिक वर्ग – वासना तत्व की प्रधानता। इस तरह प्लेटों का कहना हैं कि इन सभी को अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए।

2. आंतरिक मनोवृति :– न्याय कोई वस्तु नहीं है जो बाहर खोजने पर मिल जाएगी। अस्तु न्याय आंतरिक मनोवृति हैं जो मनुष्य के आत्मा का गुण हैं।

3. दार्शनिक सत्ता:– प्लेटों का दृष्टिकोण था कि राज्य में न्याय की स्थापना तभी संभव हैं जब वहां सत्ता दार्शनिक के हाथ में हो। दार्शनिक में ज्ञान तत्व की प्रधानता हैं इसलिए वह राज्य को चलाने योग्य हैं।

4. साम्यवाद:– प्लेटों का विचार था कि दार्शनिक शासक को चिंताओं से मुक्त रखने के लिए सैनिक और शासक वर्ग में संपति तथा स्त्रियों का साम्यवाद स्थापित करना अपरिहार्य हैं। अर्थात् प्लेटों के साम्यवाद का मतलब था कि यदि शासक वर्ग के पास निजी संपति या निजी परिवार रहेगा तो वह व्यक्तिगत स्वार्थों से जुड़ जाएगा और न्यायपूर्ण ढंग से राज्य का संचालन संभव नहीं हो पाएगा।

5. न्याय का वर्गीकरण:– प्लेटों ने न्याय के दो स्वरूप माने हैं : पहला , सामाजिक न्याय व व्यक्तिगत न्याय। प्लेटों के समाजिक न्याय से अर्थ था कि समाज में जिन तीन वर्गों ( शासक, सैनिक तथा उत्पादक वर्ग ) का विवरण दिया गया हैं वह तीनों वर्ग अपने अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करें तो समाज में न्याय स्थापित होगा। और व्यक्तिगत न्याय से अर्थ था कि जब मनुष्य ( ज्ञान, साहस और इच्छाएँ ) इन सभी का संतुलन रखता हैं तो व्यक्ति की आंतरिक प्रवृति आत्मा की आवाज होगी और इससे व्यक्तिगत न्याय स्थापित होगा।

6. सार्वभौमिक न्याय :– न्याय की परिभाषा कही पर भी बदलती नहीं हैं न्याय एक सा हैं और ये सार्वभौम हैं।

7. स्त्रियों की आजादी:– जैसा कि प्लेटों का मानना था कि न्याय सार्वभौम हैं तो न्याय को स्थापित करना स्त्रियों की आजादी जरूरी हैं जब स्त्रियों की स्वतंत्रता होगी तो वे राज्य के समुचित अवसर प्राप्त के सकेगी।

★ न्याय सिद्धांत की आलोचना :—

1. फ़त्सीवाद:– प्लेटों के न्याय की धारणा फ़त्सीवादी हैं। प्लेटों व्यक्ति को राज्य के प्रति पूर्ण निष्ठा की चाहत रखते हैं लेकिन वह व्यक्ति के अधिकारों को कहीं भी उजागर नहीं करते हैं इस प्रकार राज्य सर्वशक्तिशाली होगा। ऐसे राज्य को आधुनिक विचारक सच्चे राज्य की स्थापना के रूप में नहीं देखते।

2. कानूनहीन राज्य:– क्या किसी भी दौर में हम बगैर कानूनी व्यवस्था के सुशासन की कल्पना कर सकते हैं? क्या सभी व्यक्ति नैतिकता का आचरण ग्रहण करते हो ऐसा जरूरी हैं? इन सभी प्रश्नों का जुड़ाव हम न्याय से देख सकते हैं अगर किसी राज्य में न्याय की व्यवस्था को लागू करना है तो उसका मुख्य स्तंभ हम कानूनी व्यवस्था को मान सकते हैं। कानून व्यवस्था को बनाए रखता हैं जिससे अन्याय की संभावना कम हो जाती हैं और न्याय स्वयं में स्थापित हो जाता हैं।

3. शक्ति का समायोजन:– हालांकि कुछ सिद्धांतकारों का विचार हैं कि प्लेटों ने शक्ति का केंद्रीयकरण किया हैं और सारी सकती दार्शनिक शासक को दी हैं। ऐसे में इनका मानना है कि प्लेटों भूल जाता हैं कि कितना भी बुद्धिजीवी मनुष्य हो उसके पास सत्ता आ जाने से वह स्वयं में लीन हो जाता हैं। और ऐसी स्थिति में वह न्याय को बनाएं नहीं रख सकता।

 

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